(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाभारत का अरयण्क पर्व – Mahabharat Aranyak Parv in Hindi


॥ श्रीः ॥
3.208. अध्यायः 208
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Topics
मार्कण्डेयेन युधिष्ठिरंप्रति पतिव्रतामाहात्म्यकथनारम्भः ॥ 1 ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 3-208-0x(2469)(24105)
ततो युधिष्ठिरो राजा मार्कण्डेयं महाद्युतिम्।
प्रपच्छ भरतश्रेष्ठ धर्मप्रश्नं स दुर्वचम् ॥ 3-208-1(24106)
श्रोतुमिच्छामि भगवन्स्त्रीणां माहातम्यमुत्तमम्।
कथ्यमानं त्वया विप्र सूक्ष्मं धर्म्यं च तत्त्वतः ॥ 3-208-2(24107)
प्रत्यक्षमिह विप्रर्षे देवा दृश्यन्ति सत्तम।
सूर्याचन्द्रमसौ वायुः पृथिवी वह्निरेव च ॥ 3-208-3(24108)
पिता माता च भगवान्गाव एव च सत्तम।
यच्चान्यदेव विहितं तच्चापि भृगुनन्दन ॥ 3-208-4(24109)
मन्येऽहं गुरुवत्सर्वमेकपत्न्यस्तथा स्त्रियः।
पतिव्रतानां शुश्रूषा दुष्करा प्रतिभाति मे।
पतिव्रतानां महात्म्यं वक्तुमर्हसि नः प्रभो ॥ 3-208-5(24110)
निरुध्य चेन्द्रियग्रामं मनः संरुध्य चानघ।
पतिं दैवतवच्चापि चिन्तयन्त्य स्थिता हि या ॥ 3-208-6(24111)
भगवन्दुष्करं त्वेतत्प्रतिभाति मम प्रभो।
मातापित्रोश्च शुश्रूषा स्त्रीणां भर्तरि च द्विज ॥ 3-208-7(24112)
स्त्रीणां धर्मात्सुघोराद्धि नान्यं पश्यामि दुष्करम्।
साध्वाचाराः स्त्रियो ब्र्हमन्कुर्वन्तीह सदादृताः ॥ 3-208-8(24113)
दुष्करं खलु कुर्वन्ति पितरो मातरश्च वै।
एकपत्न्यश्च या नार्यो याश् सत्यं वदन्त्युत ॥ 3-208-9(24114)
कुक्षिणा दशमासांश्च गर्भं संधारयन्ति याः।
नार्यः कालेन संबूय किमद्भुततरं ततः ॥ 3-208-10(24115)
संशयं परमं प्राप्य वेदनामतुलामपि।
प्रजायन्ते सुतान्नार्यो दुःखेन महता विभो ॥ 3-208-11(24116)
पुष्णन्ति चापि महता स्नेहेन द्विजपुङ्गव।
`चिन्तयन्ति ततश्चापि किंशीलोऽयंभविष्यति' ॥ 3-208-12(24117)
याश्च क्रूरेषु सर्वेषु वर्तमाना जुगुप्सिताः।
स्वकर्म कुर्वन्ति सदा दुष्करं तच्च मे मतम् ॥ 3-208-13(24118)
क्षत्रधर्मसमाचारतत्त्वं व्याख्याहि मे द्विज।
धर्मः सुदुर्लभो विप्र नृशंसेन महात्मना ॥ 3-208-14(24119)
एतदिच्छामि भगवन्प्रश्नं प्रश्नविदांवर।
श्रोतुं भृगुकुलश्रेष्ठ शुश्रूषे तव सुव्रत ॥ 3-208-15(24120)
मार्कण्डेय उवाच। 3-208-16x(2470)
हन्त तेऽहं समाख्यास्ये प्रश्नमेतं सुदुर्वचम्।
तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ गदतस्तन्निबोध मे ॥ 3-208-16(24121)
मातरंश्रेयसीं तात पितृनन्ये तु मेनिरे।
दुष्करं कुरुते माता विवर्धयति या प्रजाः ॥ 3-208-17(24122)
तपसा देवतेज्याभिर्वन्दनेन तितिक्षया।
सुप्रशस्तैरुपायैश्चापीहन्ते पितरः सुतान् ॥ 3-208-18(24123)
एवं कृच्छ्रेण महता पुत्रं प्राप्य सुदुर्लभम्।
चिन्तयन्ति सदा वीर कीदृशोऽयं भविष्यति ॥ 3-208-19(24124)
आशंसते हि पुत्रेषु पिता माता च भारत।
यशः कीर्तिमथैश्वर्यं तेजो धर्मं तथैव च ॥ 3-208-20(24125)
`मातुः पितुश्च राजेन्द्र सततं हितकारिंणोः'।
तयोराशां तु सफलां यः करोति स धर्मवित् ॥ 3-208-21(24126)
पिता माता च राजेन्द्र तुष्यतो यस् नित्यशः।
इह प्रेत्य च तस्याथ कीर्तिर्धर्मश्र शाश्वतः ॥ 3-208-22(24127)
नैव यज्ञक्रियाः काश्चिन्न श्राद्धं नोपवासकम्।
या तु भर्तरि शुश्रूषा तया स्वर्गं जयत्युत ॥ 3-208-23(24128)
एतत्प्रकरणं राजन्नधिकृत्य युधिष्ठिर।
पतिव्रतानां नियतं धर्मं चावाहितः शृणु ॥ 3-208-24(24129)

इति श्रीमन्महाबारते अरण्यपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वयणि अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ 208 ॥

Mahabharata - Vana Parva - Chapter Footnotes
3-208-13 ये चक्रूरेषु इति झ. पाठः ॥ 3-208-20 प्रजाधर्मं इति झ. पाठः ॥


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